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Bhagwat Geeta in Hindi PDF

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Bhagwat Geeta in Hindi PDF : भगवत गीता एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है में से एक है जो  ना केवल धार्मिक ग्रंथ बल्कि जीवन के मार्गदर्शन को दर्शाती है हमारे कर्म, भक्ति,  ज्ञान को सही अर्थ बताती है भगवत गीता सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ में से एक है

आपको यह PDF  में दिया जायेगा साथ ही सही यह हिदी में है जिसे आप आसानी से पढ़ सकते है इस पीडीऍफ़ में कुल 951 पेज है जिसमे 18 अध्याय वर्णित एवं 700 श्लोक वर्णित है | 

भगवद गीता क्या है?: भगवत गीता हिन्दू धर्म के एक पवित्र ग्रन्थ में से एक हैं भगवान  श्री कृष्ण और अर्जुन के संवादधर्म और कर्म, मन की शांति और तनावसही निर्णय लेने की क्षमताआत्मा और परमात्मा का ज्ञान, भक्ति ज्ञान और कर्म योग का मार्ग ज्ञान समाहित है | भागवत गीता श्रीमद्भगवद गीता कहा जाता हैं 

इस आर्टिकल में आप श्रीमद् भागवत गीता के पीडीएफ को प्राप्त करेंगे जिसे आप आसानी से पढ़ सकते हैं साथ ही साथ इसमें भागवत गीता के महत्वपूर्ण अध्याय के बारे में और महत्वपूर्ण टॉपिक के बारे में बताया जाएगा सभी अध्याय के बारे में आपको पढ़ने को मिल जाएंगे साथ ही साथ आपको इसमें पीएफ का लिंक भी प्रोवाइड कर दिया जाएगा ताकि आप आसानी से पढ़ सके 

Bhagwat Geeta in Hindi PDF Overview

Post Name  Bhagwat Geeta in Hindi PDF
Category Blog/Bhagwat Geeta
PDF Name  Bhagwat Geeta book in Hindi
PDF Type  Geeta Book PDF 
Bhagwat Geeta Total Page PDF 951
Bhagavad Gita PDF Language  Hindi
Bhagwat Geeta Total Chapters 18
Bhagwat Geeta Total Slok 700
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सूचना : भगवत गीता को इंग्लिश में कही अलग-अलग शब्द के रूप में लिखा गया है आपको परेशान नहीं होना है सही का मतलव एक ही है | आपको भगवत गीता इस मीनिंग के साथ दिखाई देगे उदाहरण: bhagwat geeta, bhagavad gita, bhagwad gita इत्यादि 

 

भगवद गीता का महत्व 

हमारे जीवन में भागवत गीता इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें हमें धर्म और कर्म के मार्ग सिखाती है मन  की शांति और तनाव को दूर करती है सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है आत्मा और परमात्मा का ज्ञान स्पष्ट करती है भक्ति ज्ञान और कर्म योग की मार्ग सिखाती है यह मानव जीवन के लिए अद्भुत ग में से एक है 

भगवत गीता जीत कर्म से हमारे जीवन के लिए महत्वपूर्ण है 

भगवद गीता का महत्व

  •  धर्म और कर्म का मार्ग दिखाती है
  • मन की शांति और तनाव को दूर करती है
  • सही निर्णय लेने की क्षमता बढ़ाती है
  • आत्मा और परमात्मा के ज्ञान को स्पष्ट करती है
  • भक्ति, ज्ञान और कर्म योग का मार्ग सिखाती है
  •  मानसिक शांति
  • सकारात्मक सोच
  • निर्णय लेने की क्षमता
  • कर्मयोग का महत्व

भगवद गीता के 18 अध्याय 

अपने भगवत गीता के महत्व के बारे में तो जान लिया अब चलिए जानते हैं की भागवत गीता में कितने अध्याय होते हैं जैसा कि आप जानते हैं की भगवत गीता में 18 अध्याय  और कुल 700 श्लोक वर्णित हैं चलिए अब जानते हैं उन सभी 18 अध्याय के बारे में प्रत्येक अध्याय के महत्वपूर्ण बिंदु को भी जानते हैं शॉर्ट में

श्रीमद्भगवद्गीता हमें जीवन का वास्तविक अर्थ और मार्गदर्शन प्रदान करती है। इसमें धर्म, भक्ति, कर्म, ज्ञान, ध्यान और मोक्ष का विस्तृत ज्ञान दिया गया है। गीता हमें सिखाती है कि जीवन में कितनी भी कठिनाई क्यों न हो, हमें धर्म, सत्य और कर्तव्य के मार्ग पर चलना चाहिए। निष्काम कर्म, भक्ति और ईश्वर में पूर्ण समर्पण ही व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाता है। ?

भगवत गीता के 18 अध्याय और उसके नाम और उसमें क्या वर्णित है उसके बारे में शॉर्ट में समझाने का प्रयास करते हैं कि श्रीमद्भगवद गीता के 18 अध्याय

अध्याय 1 – अर्जुन विषाद योग: अर्जुन का मोह और विषाद

इस अध्याय में महाभारत युद्ध के आरंभ में अर्जुन का मोह और विषाद (शोक) वर्णित है। जब अर्जुन कुरुक्षेत्र में अपने सगे-संबंधियों, गुरु (द्रोणाचार्य) और पितामह (भीष्म) को देखता है, तो उसका हृदय द्रवित हो जाता है। वह सोचता है कि अपने ही प्रियजनों का वध करके विजय प्राप्त करना व्यर्थ है। अर्जुन को लगता है कि इस युद्ध से कुल का नाश होगा, जिससे समाज में अधर्म और अनैतिकता बढ़ेगी। उसके मन में कर्तव्य और संबंधों को लेकर द्वंद्व उत्पन्न हो जाता है। वह अपने धनुष (गांडीव) को नीचे रखकर युद्ध न करने का निर्णय लेता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि मोह और भावनाएँ व्यक्ति को कर्तव्य से विमुख कर देती हैं, जिससे निर्णय क्षमता कमजोर हो जाती है।

अध्याय 2 – सांख्य योग: आत्मा का ज्ञान और स्थिरबुद्धि

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा का ज्ञान देते हैं। वे समझाते हैं कि आत्मा अमर, अजर-अमर और शाश्वत है, जबकि शरीर नश्वर है। शरीर का नाश होता है, लेकिन आत्मा न कभी मरती है, न ही जन्म लेती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मयोग का उपदेश देते हैं और कहते हैं – "कर्म करो, फल की चिंता मत करो।" वे यह भी बताते हैं कि ज्ञानी व्यक्ति सुख-दुःख, हानि-लाभ में समान रहता है और अपने कर्तव्यों का पालन करता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करना चाहिए, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो। निष्काम कर्म से व्यक्ति जीवन के बंधनों से मुक्त हो जाता है।

अध्याय 3 – कर्मयोग: निष्काम कर्म का महत्व

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का महत्व समझाते हैं। वे कहते हैं कि संसार में कोई भी व्यक्ति बिना कर्म के नहीं रह सकता। श्रीकृष्ण बताते हैं कि कर्म में ही मोक्ष का मार्ग छिपा है, लेकिन कर्म को फल की इच्छा के बिना (निष्काम भाव) करना चाहिए। वे यह भी बताते हैं कि जो व्यक्ति स्वार्थ रहित होकर लोककल्याण के लिए कर्म करता है, वही सच्चा योगी और ज्ञानी होता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि कर्म करते रहना ही जीवन का धर्म है, जबकि फल की चिंता करना व्यर्थ है।

अध्याय 4 – ज्ञान कर्म संन्यास योग: ज्ञान और कर्म का संतुलन

इस अध्याय में श्रीकृष्ण ज्ञान और कर्म के संतुलन का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति ज्ञानयुक्त होकर निष्काम कर्म करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है। श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए बताते हैं कि जब-जब अधर्म बढ़ता है और धर्म का पतन होता है, तब वे अवतार लेते हैं। वे धर्म की स्थापना और साधुओं की रक्षा के लिए पृथ्वी पर आते हैं। इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि ज्ञान और कर्म का संतुलन ही जीवन को सफल बनाता है।

अध्याय 5 – कर्म संन्यास योग: संन्यास और कर्म का तुलनात्मक अध्ययन

इस अध्याय में श्रीकृष्ण कर्म और संन्यास (त्याग) का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं। वे कहते हैं कि संन्यास लेना (संसार का त्याग) आवश्यक नहीं है, बल्कि संसार में रहते हुए निष्काम कर्म करना ही श्रेष्ठ है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति कर्म करते हुए उसमें आसक्ति नहीं रखता, वही सच्चा संन्यासी है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि जीवन में त्याग के बजाय कर्तव्य पालन और निष्काम कर्म करना श्रेष्ठ है।

अध्याय 6 – ध्यान योग: ध्यान का महत्व

इस अध्याय में श्रीकृष्ण ध्यान की महिमा और उसकी प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि ध्यान के माध्यम से व्यक्ति मन को शांत और एकाग्र कर सकता है। ध्यान करने वाला व्यक्ति सांसारिक आकर्षणों से मुक्त होकर आत्म-साक्षात्कार प्राप्त करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ध्यान योगी ही सबसे श्रेष्ठ है, क्योंकि वह आत्मा और परमात्मा का साक्षात्कार करता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि ध्यान योग से व्यक्ति ईश्वर के निकट पहुँचता है और मोक्ष प्राप्त करता है।

अध्याय 7 – ज्ञान विज्ञान योग: ईश्वर का ज्ञान और विज्ञान

इस अध्याय में श्रीकृष्ण ईश्वर के ज्ञान और विज्ञान का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि समस्त सृष्टि उनकी शक्ति से उत्पन्न हुई है। वे यह भी बताते हैं कि सच्चे भक्त भक्ति योग द्वारा उन्हें प्राप्त कर सकते हैं। जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ भक्ति करता है, वह ईश्वर को प्राप्त करता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि भक्ति ही ईश्वर को प्राप्त करने का सबसे सरल मार्ग है।

अध्याय 8 – अक्षर ब्रह्म योग: परमात्मा को प्राप्त करने का मार्ग

इस अध्याय में श्रीकृष्ण मृत्यु के समय ईश्वर का स्मरण करने का महत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि जो व्यक्ति मृत्यु के समय ईश्वर का ध्यान करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता है। वे यह भी समझाते हैं कि भक्तों को ईश्वर की शरण में जाना चाहिए, ताकि वे जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो सकें। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि जीवन के अंतिम क्षण में ईश्वर का स्मरण व्यक्ति को परमगति प्रदान करता है।

अध्याय 9 – राजविद्या राजगुह्य योग: परम ज्ञान और परम रहस्य

इस अध्याय में श्रीकृष्ण परम ज्ञान और परम रहस्य का उपदेश देते हैं। वे कहते हैं कि भक्ति मार्ग सबसे सरल और श्रेष्ठ है। ईश्वर की भक्ति से व्यक्ति के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं कि जो भक्त सच्चे मन से उनकी शरण में आता है, वह कभी नष्ट नहीं होता। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर की भक्ति ही मोक्ष का मार्ग है।

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (शक्तियों) का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि संपूर्ण सृष्टि उनकी शक्ति से व्याप्त है। वे कहते हैं कि वे ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में स्थित हैं। श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि उनकी महिमा का अनुभव करना ही सच्ची भक्ति है।

अध्याय 10 – विभूति योग: भगवान की दिव्य शक्तियाँ

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों (शक्तियों) का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि संपूर्ण सृष्टि उनकी शक्ति से व्याप्त है। वे कहते हैं कि वे ही पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश में स्थित हैं। श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि उनकी महिमा का अनुभव करना ही सच्ची भक्ति है।

अध्याय 11 – विश्वरूप दर्शन योग: श्रीकृष्ण का विराट स्वरूप

इस अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन को अपना विराट स्वरूप दिखाते हैं। इस विराट स्वरूप में अर्जुन को समस्त ब्रह्मांड, देवता, ऋषि और संपूर्ण सृष्टि के दृश्य दिखाई देते हैं। श्रीकृष्ण बताते हैं कि उनका विराट स्वरूप अनंत और अद्भुत है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर की शक्ति अनंत है और उनकी भक्ति से ही व्यक्ति उनका दर्शन कर सकता है।

अध्याय 12 – भक्तियोग: भक्ति का महत्व

इस अध्याय में श्रीकृष्ण भक्ति मार्ग का महत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि ईश्वर को प्रेम, श्रद्धा और समर्पण से प्राप्त किया जा सकता है। जो व्यक्ति निःस्वार्थ भक्ति करता है, वह भगवान का प्रिय होता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि भक्ति ही मोक्ष का सरलतम मार्ग है।

अध्याय 13 – क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विवेक योग: शरीर और आत्मा का ज्ञान

इस अध्याय में श्रीकृष्ण क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का ज्ञान प्रदान करते हैं। वे बताते हैं कि शरीर नश्वर और भौतिक है, जबकि आत्मा शाश्वत और अजर-अमर है। शरीर में स्थित आत्मा ही साक्षी स्वरूप में रहती है और कर्मों का फल भोगती है। श्रीकृष्ण यह भी समझाते हैं कि सच्चा ज्ञान वही है, जिससे व्यक्ति आत्मा और परमात्मा के स्वरूप को पहचान सके। वे बताते हैं कि जो व्यक्ति आत्मा को जान लेता है, वह मोह और माया से मुक्त हो जाता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि शरीर और आत्मा को अलग-अलग समझने से व्यक्ति जीवन के रहस्य को जान सकता है और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

अध्याय 14 – गुणत्रय विभाग योग: तीन गुणों का ज्ञान (सत, रज, तम)

इस अध्याय में श्रीकृष्ण तीन गुणों – सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण का वर्णन करते हैं।

  • सत्वगुण: शांति, ज्ञान और पवित्रता का प्रतीक है। यह गुण व्यक्ति को आत्मज्ञान और सद्गुणों की ओर प्रेरित करता है।
  • रजोगुण: इच्छा, क्रोध और कर्म का प्रतीक है। यह व्यक्ति को भौतिक सुख-सुविधाओं की ओर आकर्षित करता है।
  • तमोगुण: अज्ञान, आलस्य और नकारात्मकता का प्रतीक है। यह व्यक्ति को मोह और अज्ञान में बांधता है।
    श्रीकृष्ण बताते हैं कि सत्वगुण व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाता है, जबकि रजोगुण और तमोगुण उसे सांसारिक बंधनों में बांधते हैं। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति को सत्वगुण को अपनाना चाहिए, जिससे वह मोक्ष के मार्ग पर अग्रसर हो सके।

अध्याय 15 – पुरुषोत्तम योग: सर्वोच्च पुरुष का ज्ञान

इस अध्याय में श्रीकृष्ण परम पुरुष (ईश्वर) का ज्ञान प्रदान करते हैं। वे संसार को एक उल्टा वृक्ष बताते हैं, जिसकी जड़ें ऊपर (परमात्मा में) और शाखाएँ नीचे (संसार में) हैं। वे कहते हैं कि इस संसार रूपी वृक्ष को मोह और आसक्ति रूपी कुल्हाड़ी से काटकर व्यक्ति को ईश्वर की शरण में जाना चाहिए। श्रीकृष्ण बताते हैं कि परम पुरुष (ईश्वर) ही समस्त सृष्टि का आधार हैं और जो व्यक्ति उन्हें जान लेता है, वह जन्म-मरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर ही परम सत्य हैं और उनकी शरण में जाना ही मोक्ष का मार्ग है।

अध्याय 16 – दैवासुर सम्पद विभाग योग: दैवी और आसुरी गुण

इस अध्याय में श्रीकृष्ण दैवी और आसुरी गुणों का वर्णन करते हैं।

  • दैवी गुण: अहिंसा, सत्य, क्षमा, शांति, संयम, दया और श्रद्धा जैसे सद्गुण दैवी सम्पत्ति का प्रतीक हैं।
  • आसुरी गुण: क्रोध, घृणा, लोभ, कपट, अहंकार और ईर्ष्या जैसे दुर्गुण आसुरी सम्पत्ति का प्रतीक हैं।
    श्रीकृष्ण बताते हैं कि दैवी गुण व्यक्ति को मोक्ष की ओर ले जाते हैं, जबकि आसुरी गुण उसे अधोगति (पतन) की ओर ले जाते हैं। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति को दैवी गुणों को अपनाना चाहिए, जिससे वह ईश्वर के मार्ग पर चल सके और जीवन को सफल बना सके।

अध्याय 17 – श्रद्धात्रय विभाग योग: श्रद्धा के तीन प्रकार

इस अध्याय में श्रीकृष्ण श्रद्धा के तीन प्रकार बताते हैं – सत्वगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी श्रद्धा।

  • सत्वगुणी श्रद्धा: पवित्रता और निष्काम भक्ति से युक्त होती है। यह व्यक्ति को सत्य, दया और धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती है।
  • रजोगुणी श्रद्धा: इसमें व्यक्ति अपनी इच्छाओं और भौतिक सुखों की पूर्ति के लिए कर्म करता है। इसमें स्वार्थ की भावना होती है।
  • तमोगुणी श्रद्धा: यह अज्ञानता और अधर्म से जुड़ी होती है। इसमें व्यक्ति हिंसा, पाखंड और अंधविश्वास को अपनाता है।
    श्रीकृष्ण बताते हैं कि सत्वगुणी श्रद्धा मोक्ष की ओर ले जाती है, जबकि रजोगुण और तमोगुण व्यक्ति को संसार के बंधनों में बांधते हैं। इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति को सत्वगुणी श्रद्धा अपनाकर जीवन को पवित्र और मोक्षमार्गी बनाना चाहिए।

 

अध्याय 18 – मोक्ष संन्यास योग: मोक्ष का ज्ञान और संन्यास का महत्व

यह अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। इसमें श्रीकृष्ण मोक्ष और संन्यास का महत्व बताते हैं। वे अर्जुन को समझाते हैं कि संन्यास केवल कर्म का त्याग नहीं है, बल्कि फल की आसक्ति का त्याग ही सच्चा संन्यास है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति निष्काम भाव से अपने कर्तव्यों का पालन करता है, वही मोक्ष प्राप्त करता है। वे अर्जुन को अंतिम उपदेश देते हैं – "सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज", अर्थात् "सभी धर्मों को छोड़कर मेरी शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा और तुम्हें मोक्ष प्रदान करूँगा।"
इस अध्याय का मुख्य संदेश यह है कि ईश्वर में पूर्ण समर्पण ही मोक्ष का सर्वोच्च मार्ग है।

भगवद गीता के प्रमुख उपदेश

भगवद गीता में जीवन को सही दिशा में ले जाने वाले अमूल्य उपदेश दिया गये है अगर आप इसने अपने जीवन में धारण करते है तो आपको किसी भी प्रकार के परेशानी नहीं होगी और अपने लक्ष्य की प्राप्ति, मन में अन्य गलत विचार, अपने कार्य सही निर्णय, ब्रह्मचर्यं जीवन का पालन सही संगत एवं ज्ञान की प्राप्ति होगी  | चलिए आब कुछ ऐसा उदेश के बारे में जानते है जिसने आपके कभी न कभी जरुर हुना होगा | 

भगवद गीता के प्रमुख उपदेश 

उपदेश

अर्थ और जीवन में महत्व

"कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर"  ( भगवन श्री कृष्ण )  यह उपदेश हमें सिखाता है कि हमें अपने कर्तव्यों का पालन बिना फल की चिंता किए करना चाहिए। इससे हम तनावमुक्त रहते हैं और अपने कर्म को पूरी लगन और निष्ठा से करते हैं।
"मनुष्य अपने विश्वास से निर्मित होता है"  ( भगवन श्री कृष्ण ) व्यक्ति का विश्वास ही उसकी पहचान बनाता है। सकारात्मक विश्वास व्यक्ति को सफलता की ओर ले जाता है, जबकि नकारात्मक सोच उसे पतन की ओर ले जाती है।
"जो हुआ, अच्छा हुआ। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है। जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा" ( भगवन श्री कृष्ण ) यह उपदेश जीवन में धैर्य और विश्वास बनाए रखने का पाठ सिखाता है। भूतकाल के बारे में पछताना या भविष्य को लेकर चिंतित होना व्यर्थ है। हमें वर्तमान में जीना चाहिए।
"इच्छाओं का त्याग ही सच्चा सुख है" ( भगवन श्री कृष्ण ) श्रीकृष्ण बताते हैं कि इच्छाएँ व्यक्ति को बंधनों में बांधती हैं। उनका त्याग करके ही सच्चा सुख और शांति प्राप्त होती है।
"क्रोध से भ्रम उत्पन्न होता है, भ्रम से बुद्धि का नाश होता है" ( भगवन श्री कृष्ण ) क्रोध व्यक्ति को अंधा कर देता है, जिससे उसकी सोचने-समझने की शक्ति नष्ट हो जाती है। यह उपदेश क्रोध पर नियंत्रण रखने की शिक्षा देता है।
“सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीत-हार में समभाव रखो” ( भगवन श्री कृष्ण ) जीवन में सुख-दुःख और सफलता-विफलता आती रहती हैं। हमें हर परिस्थिति में धैर्य और समान भाव रखना चाहिए।
"जन्म लेने वाला व्यक्ति मृत्यु को प्राप्त होगा और मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति पुनः जन्म लेगा" ( ( भगवन श्री कृष्ण ) यह उपदेश हमें जीवन और मृत्यु के चक्र का ज्ञान कराता है। मृत्यु के बाद आत्मा पुनः नए शरीर में जन्म लेती है, इसलिए मृत्यु का भय नहीं रखना चाहिए।
"स्वयं को जीतना सबसे बड़ी विजय है"  ( भगवन श्री कृष्ण ) आत्मसंयम और इच्छाओं पर नियंत्रण ही सबसे बड़ी जीत है। जो व्यक्ति अपने मन पर विजय पा लेता है, वह सच्चा विजेता होता है।
"जो अपने मन को नियंत्रित नहीं कर सकता, वह स्वयं का शत्रु बन जाता है"  ( भगवन श्री कृष्ण ) यह उपदेश आत्म-संयम की शिक्षा देता है। यदि हम अपने मन पर नियंत्रण नहीं रखते, तो वह हमारा सबसे बड़ा शत्रु बन जाता है।
"भक्त मुझे सहज भाव से स्मरण करते हैं, मैं उन्हें प्राप्त होता हूँ" ( भगवन श्री कृष्ण ) यह उपदेश भक्ति मार्ग का महत्व दर्शाता है। सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण करने वाले भक्त को ईश्वर स्वयं प्राप्त होते हैं।

 

भगवद गीता के उपदेशों का जीवन में महत्व:

भगवद गीता के उपदेश न केवल युद्धभूमि में अर्जुन का मार्गदर्शन करते हैं, बल्कि आज के जीवन में भी बेहद प्रासंगिक हैं। इन उपदेशों का हमारे जीवन में निम्नलिखित महत्व है:

  • कर्म पर ध्यान देना: गीता हमें सिखाती है कि जीवन में हमें अपने कार्य पर ध्यान देना चाहिए, न कि उसके परिणाम की चिंता करनी चाहिए। इससे हम तनावमुक्त रहते हैं और कार्य को पूरी लगन से करते हैं
  • आत्म-नियंत्रण का महत्व: गीता के अनुसार, जो व्यक्ति अपने मन और इच्छाओं पर नियंत्रण पा लेता है, वह सच्ची शांति प्राप्त करता है। यह उपदेश हमें संयम और धैर्य सिखाता है
  • धैर्य और संतुलन: गीता हमें सुख-दुःख, लाभ-हानि और जीवन-मृत्यु में समान भाव रखने की सीख देती है। इससे हम विपरीत परिस्थितियों में विचलित नहीं होते और धैर्यपूर्वक आगे बढ़ते हैं
  • क्रोध और मोह पर नियंत्रण: श्रीकृष्ण सिखाते हैं कि क्रोध व्यक्ति की बुद्धि को नष्ट कर देता है, जिससे निर्णय शक्ति कमजोर हो जाती है। इसलिए हमें क्रोध पर नियंत्रण रखना चाहिए
  • भक्ति का महत्व: गीता बताती है कि ईश्वर में पूर्ण विश्वास और समर्पण करने वाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है।
  • आध्यात्मिक जागरूकता: गीता हमें सिखाती है कि शरीर नश्वर है, लेकिन आत्मा अमर है। यह ज्ञान व्यक्ति को मृत्यु का भय छोड़कर धर्म और कर्तव्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

भगवद गीता PDF डाउनलोड 

चलिए अब जानते हैं की भगवत गीता के PDF download कैसे आप कर सकते है Step By Step समझते है | आपको इस पीडीऍफ़ में कुछ 970 पेज रहेगें जो बहुत ही अच्छी क्वालिटी के जिससे आपको पढ़ने में आसानी होगी आप इसे आसानी से ऑनलाइन पढ़ सकते हैं.। भगवत गीता पढ़ने के लिए आपको किसी भी प्रकार की पैसे देने की आवश्यकता नहीं है आप इसे अपने में इस वेबसाइट की मदद से रोजाना पढ़ सकते हैं फ्री में और इसे डाउनलोड करके अपने मोबाइल में सेट कर सकते हैं भगवत गीता के डाउनलोड लिंक आपको नीचे मिल जाएंगे 

सूचना : इस पोस्ट में जो आपको PDF provide किया जायेगा उसे आप सिर्फ पढ़ सकते है लाइफ टाइम तक सुने download नहीं कर पायेगे , ऐसा इसलिए किया गया है ताकि इस पीडीऍफ़ के साथ कोई चंगे का टेक्स्ट को एडिट नहीं कर सकते | इस पीडीऍफ़ में गलत जानकारी नहीं ऐड कर सकते | आपको पीडीऍफ़ को पढने में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं होगी

 7. निष्कर्ष 

भगवद गीता एक ऐसा ग्रंथ है, जो जीवन को सही दिशा में ले जाने में मदद करता है। यदि आप जीवन में शांति, सफलता और आत्मज्ञान चाहते हैं, तो भगवद गीता को जरूर पढ़ें।
नीचे दिए गए लिंक से आप श्रीमद्भगवद गीता हिंदी PDF फ्री में डाउनलोड कर सकते हैं।

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